रविवार, मई 24

प्यार इश्क और यह क्या ? EXCLUSIVE

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प्यार क्या होता है ,क्या यह एक इतफाक है ,या यह एक परम्परा है जो कई सदियों से अनजाने साए के साथ हमारे साथ चलती आ रही है ,दरअसल मेरा यह लेख इसी परम्पराओं को झुट्लाते हुए एक कहानी का निर्माण करता है ,जो बेशक मेरी हो सकती है मेरे दोस्तों की हो सकती है या फिर ऐसा भी हो सकता हैं की आगे जो मैं लिखने वाला हूँ वो आप के आस पास कही घट रही हों ,चैनल यानी मेरा ऑफिस -वक्त तक़रीबन ७:५० के आस पास मेरी कहानी में तीन पात्र है जो तीन दोस्त भी है यह वही पात्र है जिनके आस पास पूरी कहानी घुमती रहती है पहले पात्र का नाम तो आशीष है जो वास्तविक है दुसरे पात्र का नाम रोहन है और तीसरे का नाम लोक है और कहानी का 4th पात्र एक लड़की .........................................नहीं बाबा दो ............................माफ़ी चाहूँगा ..............तीन ......चार ......दस या फिर बारह है,
मैंने भी आपकी तरह सुना था की प्यार एक बार होता है शायद यह सच ना हो .इस कहानी का आशीष सिर्फ कहानी को गढ़ रहा है ,यह आपको याद रहे रोहन मेरा चार साल से अधिक वक्त का दोस्त है ,उम्मीद के मुताबिक मेरी हर भावनाओं को वो और मैं उसकी सवेंदना को समझता रहा हूँ ,उसको उसका प्यार कॉलेज में मिल चुका है ,मुझे याद है उस वक्त आँखों में आंसू लेकर अपने सीने से उसकी यादों और उसकी हर बातों को वो मुझसे शेयर किया करता था ,आज बेशक हालत कुछ और है ....यह उसकी प्यार की मजबूती है या फिर कुछ और ....सच में मैं नहीं जानता ,,,,उसका प्यार उससे बातें करता है ,उससे दिल की हर बात समझता है ,कभी कभी वो इतराता भी है ,लेकिन फिर एक बार आँखों को नीचा करके ना जाने क्यों आँखों में आँसूं के समंदर भर लाता है शायद मुझे नहीं कहना चाहिए -लेकिन उसकी जिंदगी में सब कुछ सहीं नहीं चल रहा है ,उसकी तरह मेरे कही दोस्तों को लगता है की वो और उसका प्यार दरअसल एक दुसरे के लिए बने है नहीं ....लेकिन मैं खुद्दार हूँ ,कहानी का लेखक भी मैं ही हूँ -मैं गलत नहीं हो सकता ,,,,,बस यही चीज़ मुझे खा जाती है ,हफ्तें में एक दिन हमारा ऑफ होता है मैं अपनी जिंदगी के सबसे प्यारें दोस्त से मिलता हूँ और वो ..........................................वो .................................वो शायद नहीं ......दरअसल उसके साथी की कहानी मेरे दोस्त की जिंदगी पर हमेशा से हावी रही है ,,,और हो भी क्यों ना ,,,,,उसने कही सवाल अपनी प्रेमिका से करने की कोशिश भी की ....लेकिन उसके जवाबों में वो इतराता नहीं ...और ना ही शर्माता है .बस गुम सुम सा अकेला घबरता है .......फिर तड़प के अपने आप से एक सवाल पूछता है की अफेयर को तीन साल से भी ज्यादा हो गए है ..फिर भी अपने सर को जुन्झुनाते हुए अपने आप से कहता है की नहीं वो सच में सच्ची है ....................कहानी का तीसरा पात्र लोक है ,जनाब शानदार है ,कॉलेज में रूतबा था ,अरे भाई पढाई में नहीं सिर्फ लड़कीबाजी में ,जनाब की कौन से गर्ल फ्रेंड है और कौन सी दोस्त यह कोई नहीं जानता ,कॉलेज में इंग्लिश ओनर्स को ताड़ते थे ,अब थोड़े से बड़े हो गए है ,अब सैलरी भी मिल रही बेशक मोटी तनख्वाह ना हो लेकिन ख्वाब बेहद शानदार है ,हताश भी हो जाते है अगर थोडा सा काम ज्यादा करवा लो तो ....तो हाँ कॉलेज में नए आये तो एक ग्रुप में शामिल हुए ...कुछ दोस्त मिले कुछ बहुत ज्यादा अच्छे मिले जिस ग्रुप में थे वही प्यार कर बैठे ,,,,हालत तो उसवक्त खराब हुई जब पता लगा की अरे भाई जिस से प्यार -----अरे भाई माफ़ी चाहूंगा -प्यार इन जनाब को हर रोज़ प्यार होता है ,और ऐसा वेसा नहीं ,रात भर बातें करते है ,फिर शुभ रात्री कह कर सुबह का मेसज टाइप करते है -कहानी का दूसरा रूप उनके एक नए चेहरे को बतलाता हैं वो बताता है की सच में उससे प्यार हुआ ,उसकी तड़पन उसकी बातों पर मोहर लगाती है ,संजीदगी यहाँ तक की बन्दा रोया भी है ...लेकिन यह क्या साहब वो तो चुप हो गया एक नई सुबह के लिए ....TO BE CONTINUE

बुधवार, मई 20

एंकर और मोडल में फर्क है भाई .....

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आखिरकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने यह स्पस्ट कर दिया कि हम सबकी अपनी-अपनी दुकाने है जिनमे बैठने वाले वाले लोग पत्रकार का चोला पहने हुए है जिसमे खबरें विज्ञापन के लिए बिकती है ना कि पत्रकारिता के लिए ....हम आपको बता दे कि खबर वही बिकाऊ होगी जिसमे sex होगा ,खेल होगा .गाने -बजाने होंगे और मोजूद होंगे कुछ हसीनाओं के चेहरे ....जी हां जनाब ०- हम बात किसी गली -मोहल्ले के नही बल्कि आपके -अपने मीडिया की कर रहे है ,इन दुकानों को चलाने के लिए मौजूद होते है कुछ हसिनाओ की खुशबु लिए अपने न्यूज़ वाले यानी नए जमाने की नयी पत्रकारिता ..यानी महिला पत्रकार ......हम अगर शब्दों को सही करे तो महिला एंकर .............यानी नया पर्दा नया रूप नया मुकाम और नया और जबरदस्त ग्लैमर लिए पत्रकारिता -यह हकीक़त है की इस नए पत्रकारिता का आगाज हिंदुस्तान में हो चूका है -आप टीवी खोले कर देखिए तो सही -ऐसा लगता है मानो ये महिलाए रेम्प के बजाए न्यूज़ स्टूडियो मे अपने कपडे उतार देंगी ......इंग्लैंड मे तो यह हो चुका है ...खैर पत्रकारिता को बेचकर अपनी दुकान चलाने वालो को यह टी.र.पी का नया फार्मूला लग रही है --कुछ लोगो ने तो इस पर आवाज भी उठाई लेकिन हम कहा बाज आने वाले थे -चलिए अब राज खुले तो मैं बता दू हाल ही मे एक नया न्यूज़ चैनल आया पता चला कि वहा पर जॉब के चांस है मेरी महिला मित्र के साथ हुआ था यह हादसा सारे प्रशन पूछने की बाद वहा के hr ने कहा मैं आपसे संतुष्ट हूँ अब यह बताओ मेरे लिए क्या कर सकती हो ? आख़िर इस जिस्म की ज्यादा भूख मीडिया मैं क्यों ? ...मैं महिला पत्रकार हूँ -मेरे अपने आदर्श है मैं लड़की हूँ वही लड़कीं जिसके बारे में सिमोन द बोवा ने कहा था कि वो पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। लोग मुझे तरह-तरह से बनाते हैं। मुझे सेवा करने लायक बनाते हैं। सुंदर दिखने लायक बनाते हैं। वो मेरा तन तराशने से पहले मेरा मन तराशते हैं। बताते हैं, खूबसूरत दिखना मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद है। वो पहले अपने आनंद के लिए मेरा इस्तेमाल करते हैं, फिर अपने कारोबार के लिए। वो मेरी कोमलता से अपना सामान सजाते हैं, मेरी सुंदरता से अपनी दुकान। मैं जब studio par hoti हूं तो सबसे पहले अपने वजूद पर पांव रखती हूं। मुझे मालूम रहता है कि ये नाजुक संतुलन, ये खूबसूरत लचीलापन, ये shandaar kaaya , ये रोशनियां, ये चमक-दमक मेरे लिए नहीं, एक बड़े कारोबार के लिए है। मुझे मुस्कुराना है, मुझे बातें kahanii हैं, मुझे अपनी घबराहट, अपने आंसू रोकने हैं, अपने उस शर्मीलेपन को कुचलना है जो किसी बचपन से कहीं से मेरे साथ चला आया। मुझे आत्मविश्वास और कामयाबी से भरपूर नजर आना है, इस डर को दबाना है कि जब ये तराश नहीं रहेगी, जब वक्त की रेखाएं मेरे जिस्म पर दिखाई देने लगेंगी, जब जिंदगी की आपाधापी में मेरे पांव कांपते रहेंगे, तब मेरा क्या होगा। मैं लड़की हूं। अपनी त्वचा से प्यार करती हूं, सुंदर दिखना चाहती हूं, कोमल बने रहना चाहती हूं, लेकिन नहीं जानती कि इन मासूम इच्छाओं के लिए मुझे कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। सिर्फ मुझे मालूम है कि सुंदरता तन से कहीं ज्यादा मन में होती है, दृश्य से कहीं ज्यादा आंख में होती है, वो तराशी नहीं जाती, अपने वजूद और अपनी शख्सियत की एक-एक शै के बीच ढलती है, और बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब वो अपनी पूरी कौंध के साथ दिखाई पड़ती है। दरअसल वो रैंप पर सैकड़ों लोगों के बीच की नुमाइश में जितना नजर आती है उससे कहीं ज्यादा उन रिश्तों में झलकती है जिसमें देह ही नहीं, रूह तक पारदर्शी हो जाती है। बढ रहे न्यूज़ चेनल और उनकी दुकानों में अब उनके संस्थान भी शामिल हो चुके है ,जहा पर एंकर बनाने के लिए एक मोटी राशि ली जाती है ,जितने बड़े चैनल उतनी बड़ी राशि .अगर आप की कोई चाहत है की आप को लोग देखे .....और आप सुन्दर नहीं है आपके पास कोई काया नहीं है तो घबराते क्यों है भाई ...पत्रकारिता की नई बिरादरी आपको शामिल करेगी अपने बाज़ार में ...और आप बन जायेंगे एंकर विचार -आशीष और प्रियदर्शन जी से प्रेरित

मंगलवार, मई 19

यहाँ लाशों का मंजर क्यों है........

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आदर्शों के विचार सिद्धांत कब बन जाते है ,सच में पता नहीं लगता ....इस बार मेरे ब्लॉग में जो लेख मैं प्रकाशित कर रहा हूँ ,वो मेरा नहीं अपितु ndtvkhabar.com से लिया गया है ,जो मेरे गुरु और साथ में आदर्श रहे प्रियदर्शन द्बारा लिखा गया है

पिछले साल 2 अक्टूबर को, यानी महात्मा गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुताबिक एक और इतिहास बना। अमेरिकी सीनेट ने एटमी करार पर मोहर लगाकर भारत की नाभिकीय अस्पृश्यता ख़त्म की। क्या इस इस इत्तफाक पर हमें हैरान होना चाहिए कि जीवन भर अहिंसा की बात करने वाले और ऊर्जा और उत्पादन के देसी तौर-तरीक़ों पर भरोसा करने वाले महात्मा गांधी को उनके देश ने उनके जन्मदिन की सौगात के रूप में एटमी करार दिया... या हमें उदास होना चाहिए कि किसी की नज़र इस इत्तफाक पर नहीं पड़ी और किसी ने उस विद्रूप पर विचार नहीं किया, जो महात्मा गांधी और एटमी करार को मिलाने से बनता है...?
कहते हैं, कभी अपने एक भाषण में खुद को कुजात गांधीवादी बताने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि 21वीं सदी में या तो महात्मा गांधी बचे रहेंगे या परमाणु बम बचा रहेगा। एक ढंग से देखें तो दुनिया भर के परमाणु बम किन्हीं जखीरों में छिपे हुए हैं और किसी को डराने का काम भी नहीं करते। एक दौर में वियतनाम में बुरी तरह अपने हाथ जला लेने वाले अमेरिका को अपने परमाणु बम याद नहीं आए। सोवियत संघ टूट गया और उसको उसके परमाणु बम नहीं बचा सके। चीन की ताकत उसके परमाणु बम से कहीं ज्यादा उसके आर्थिक धमाके से है।
दूसरी तरफ आज की हिंसा और नफरत में महात्मा गांधी की जगह नहीं दिखती। लेकिन सच्चाई यह है कि सांस्कृतिक बहुलता का मुद्दा हो या पर्यावरण की सजगता का, हम महात्मा गांधी की तरफ लौटने को मजबूर हैं। यह धारणा धीरे-धीरे मज़बूत हो रही है कि भोग और लालच की मारी इस दुनिया में न्याय और बराबरी की तरफ लौटने का सबसे भरोसेमंद रास्ता गांधी की गली से होकर जाता है। शायद यह मुहावरा सबसे ज्यादा सार्थक आने वाले दिनों में ही होगा कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी।
लेकिन मामला परमाणु बम या महात्मा गांधी की प्रासंगिकता का नहीं है, एक देश के तौर पर भारत के वर्तमान और भविष्य का है। महात्मा गांधी ने जिस भारत के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी, उसे न परमाणु बम की ज़रूरत थी, न परमाणु ऊर्जा की। गांधी उसे बिल्कुल देसी ज़रूरतों और देसी तकनीक पर केंद्रित एक देश बनाना चाहते थे। यह सच है कि गांधी के सपनों का भारत आज़ादी के बाद से ही बिखरना शुरू हो गया, लेकिन आज उसके भटकाव कहीं ज़्यादा विचलित करने वाले हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे इस दौर का भारत अपनी सारी राजनीतिक-वैचारिक बहसें पीछे छोड़ चुका है और उसके सामने सिर्फ आर्थिक महाशक्ति बनने का लक्ष्य है। जो बहुत बड़ी गैर-बराबरी इस देश को लगभग दो हिस्सों में बांट रही है, उस पर किसी की नजर नहीं है, उसकी किसी को परवाह नहीं है।
यह दरार सिर्फ आर्थिक नहीं है, उसके सामाजिक और सांप्रदायिक पहलू भी हैं। एक तरफ आरक्षण के सवाल पर उलझे हुए अगड़े और पिछड़े हैं, दूसरी तरफ मजहबी पहचान के सवाल पर अकेले पड़े मुसलमान और घायल पड़े ईसाई हैं। इसके अलावा वह विशाल दलित और आदिवासी आबादी बिल्कुल हाशिये पर है, जो हर जगह से बेदखल की जा रही है। भारतीय राजनीति इन विशाल समुदायों और इन बड़े सवालों को नज़रअंदाज़ कर रही है।
दरअसल यह भारतीय राजनीति की बदली हुई प्राधमिकता है, जो एटमी करार को ऐतिहासिक बताती है और खुद को सही साबित करने के लिए एक पुराने सामाजिक आंदोलन का मुहावरा चुराते हुए नाभिकीय अस्पृश्यता जैसा शब्द इस्तेमाल करती है। अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन आजादी के दौर का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा और महात्मा गांधी ने इसे लगभग अपनी निजी मुहिम की तरह लिया। अस्पृश्यता का दंश कितना तीखा है और उसने भारतीय समाज को कैसी टूटन दी है, जो यह बात समझते हैं, उन्हें एटमी संदर्भ में भारत की अस्पृश्यता के रूपक की विडंबना शायद कुछ ज़्यादा समझ में आएगी।
दरअसल जो लोग भारत की एटमी अस्पृश्यता का सवाल उठा रहे हैं, वे एक और सच्चाई को गलत संदर्भ में पेश कर रहे हैं। भारत ने जब एटमी परीक्षण किए, तभी यह साफ था कि इस मुद्दे पर उसे अकेला रहना पड़ सकता है। इस लिहाज से यह चुना हुआ अकेलापन ज्यादा था, थोपी हुई अस्पृश्यता नहीं। भारत के पास इस अस्पृश्यता को तोड़ने के और भी तरीके थे - उन तरीकों का हमने इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि उन्हें अपनी आणविक और वैश्विक नीति के विरुद्ध पाया।
इस पूरे संदर्भ को भुलाकर मनमोहन सिंह ने जिस तरह एटमी करार को अमेरिकी मेहरबानी बताया है और जॉर्ज बुश जैसे विवादास्पद राष्ट्रपति को सभी भारतीयों का प्रिय साबित करने की कोशिश की है, उससे साफ है कि उनका अपना भारत है, जो महात्मा के भारत से भिन्न है। वरना महात्मा तो वे थे, जो कभी अमेरिका नहीं गए। यह तय है कि अमेरिकी करार उन्हें उस तरह नहीं लुभाता, जिस तरह आज के रहनुमाओं को लुभा रहा है। वह होते तो शायद आज के भारत की परमुखकातरता पर कहीं ज्यादा दुखी होते।

रविवार, मई 17

ब्लू फिल्म जूते और लोकतंत्र

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चुनाव की रण भेरी समाप्त हो गई .इस बार खूब नारे बाज़ी हुई ,अरे भाई नारे बाज़ी ना ऐसा तो हो ही नहीं सकता ,नारे बाज़ी भी ऐसी की अपने घर को आग लगी अपने ही चिराग से -समाजवादी पार्टी में तो जया और आज़म मे इतनी ज्यादा बन आई की समाजवादी के अमर सिंह को आगे आकर यह कहना पड़ा की लड़ाई बहुत बढ गई हालत यहाँ तक है की जया की ब्लू फिल्म भी बाज़ार में आने वाली है,ऐसा नहीं जनाब इस बार बात ब्लू फिल्म पर आकर रुक गई इससे पहले तो इतना हुआ जिसने हिन्दुस्तां का सीना चोडा जरुर हो सकता है ,अरे भाई वक्त वक्त पर साम्प्रदाय की आग में जलने वाला हिन्दुतान पहली बार खुश सा दिख रहा था ,अरे भाई इस बार एकता की नई परिभाषा हमारे सामने मौजूद थी ,यह जूतों का लोकतंत्र बन गया ,जूते ऐसे वेसे नहीं महंगे महंगे जूते ,शहर वालों के जूते गाँव वालों के जूते ,लेकिन पता नहीं इन जूतों का जन्म कहा हुआ था इन्होने ना तो जाती पाती देखी और ना ही कोई कद देखा ,बस शक्ल देखी और धडाम ....................ना कोई कद देखा और ना शरीर......आडवाणी पिटे .वितमंत्री पिटे अरे भाई अमेरिका में बुश को जूता उस वक्त पड़ा था जब वो अपने पद से इस्तीफा दे चुके थे ,मुझे पता है आप हिन्दुस्तानी लोग इतराते अधिक हो ,लेकिन सच में मेरे लिए यह एक सुखद अनुभव है की कम कम से हमारा जूता तो जाति ,रंग भेद नहीं जानता
शायद कभी गांधी ने भी नहीं सोचा होगा की उनके हिन्दुस्तान के हर व्यक्ति में इतना मैल भर गया है ..लेकिन शायद वो इतरा रहे हो की कम से कम हिन्दुतान की जूते तो जाती पाति से कोसो दूर है

गुरुवार, अप्रैल 30

न्यूज़ रुम vs wwe ................

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जल्द आ रहा है ॥न्यूज़ रुम vs wwe

ये केसा न्यूज़ रूम जहा पर होती है सिर्फ हाथापाई

हाथापाई का न्यूज़ रुम

पढने के लिए देखते रहिए ...exclusivebharat.blogspot.com

जल्द आ रहा है .....

रविवार, अप्रैल 26

हर जगह मातम ...सिर्फ मातम..और कुछ नही

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इस रोड पर इस कदर कीचड़ पडी है हर किसी का पाव घोटूंओ तक सना है शायद कभी दुष्यंत कुमार ने यह नहीं सोचा होगा की उनकी लिखी हुई पंक्तिया अपने देश के किसी पर ठीक बैठेंगी इस देश में मातम है, या हर किसी को मातम में जीने की आदत पड़ गई है,सुबह के 11:30 बज रहे है ,मैं मोजूद हूँ अपने न्यूज़ रूम में जहा से अपना ब्लॉग टाइप कर रहा हूँ ,मन में बार बार यही सवाल कोंध रहा है की क्या होगा .टॉप मेनेजमेंट बार यही कह रहा है की अब छटनी नहीं होगी ,.लेकिन टॉप का मतलब टॉप ही होता है खैर एक बड़े न्यूज़ रूम से बड़े न्यूज़ स्कूल का मतलब क्या होता है क्या आपका भविष्य एक नई परिभाषा को रच देगा ,आप की ज़िन्दगी उन मुकामों की कहानी रच देगी जिसके बारे में आपने और मैंने कभी नई सोचेगा ...आज तक ,न्यूज़ २४ ,वौइस् ऑफ़ इंडिया .और अब NDTV की दुकाने अब सजने लगी है जहा पर सपने बिकते है जहा हर रोज़ नए सपने जिस तरीके से दाखिल होते है उससे कही बुरी तरह वो टूट जाते है ,कुछ ऐसा ही हो रहा है ,आज हमारे साथ PKG 15000 जब हम एक बड़े न्यूज़ चेनल के एक बड़े स्कूल के दाखिल हुई तो कुछ सपने मैंने भी देखे थे ,उम्मीद करता हूँ मेरी माँ ने भी कोई ख्वाब देखा हो क्योकि ख्वाब तो वो आँखें देखती है जो कभी सोती हों ,लेकिन उन आँखों का क्या जो कई मुद्दतों से सोई ही ना हो ,मेरे माँ भी कुछ ऐसी है ,मेरे तरह से सेकडों लोग ऐसे है जो अपने सपनो को हर रोज़ यहाँ लुटते हुए देख रहे है ,सिर्फ देख रहे है हम कुछ नहीं कर सकते है ,कईयों के सपने टूट गए ,कई लोग ऐसे है जो अपने घर में सबसे बड़े है वो जिनके घर में कोई बड़ा नहीं था जो अपनी पूरी ज़मीन बीस हज्जार में बेच कर आये थे ,अपने सपनो को खरीदने के लिए ........लेकिन उन्हें अभी पता लगा है की उनको चेनल से निकाल दिया जायेगा ,बिना किसी कारण .हम कुछ नहीं कर सकते HR के पास जा जा कर अब थकावट महसूस होने लगी है .जिन लोगो ने ब्याज पे पैसा लिया था वो अब दुगना हो गया है ,कुछ ऐसे भी है जिनके पास कल के खाने के लिए रोटी नहीं है कुछ ऐसे भी जो अपने घर जाना नहीं चाहते ,क्योंकि उनको याद आते है वो पल जो वो घर से आते वक्त वो अपनी माँ के सीने से लिपटकर सजाकर आये थे ,मैं भी सोच रहा था की उन सपनो का क्या होगा ,शायद हमारा भविष्य उस बिसात पर चल रहा है जहा मोहरे के भूमिका पर हम और चलाने वालो की भूमिका किसी और की है ,मैं जानता हूँ कि खामोशी भी बोलती है... कि बहते हुए आंसुओं से ज्यादा तकलीफ पलकों पर ठहरे मोती पैदा करते हैं...कि रुलाइयों से ज्यादा असरदार भिंचे हुए होठों के पीछे छुपाए गए दुख होते हैं।जाहिर है भक्त मीडिया और बाजार का यह रिश्ता पहले से मजबूत हुआ है और आगे भी होता रहेगा। हम अजीब लोग हैं। उपभोग और आध्यात्म को साथ साथ जीते हैं। दोनों से कोई टकराव नहीं बल्कि दोनों से हमारा एक समझौता है। मैं नही जानता की कहानी क्या रंग लाएगी ,लेकिन इतना जरुर है की लोकतंत्र का यह कौन सा प्रहरी है जो आज अपने दुकानों को सज़ा रहा है जहा हर रोज़ सपनो को बेचा जा रहा है ,लेकिन शर्मशार उस वक्त होते है जब इन दुकानों में हम सब नीलाम हो रहे है कबाडे के भाव ,सवाल मेरे नही सवाल उन लोगों का जो अपनी ज़मीन बेचकर अपना सब कुछ बेचकर इन दुकानों में आए थे ,......................

मंगलवार, अप्रैल 21

अलविदा सर ,अपना ख्याल रखना

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अलविदा सर ,अपना ख्याल रखना
आखिरकार वही हुआ जिसका डर था ,निशांत सर हम हमारे साथ काम नहीं करेंगे .सच में यही खबर तो मिली थी हमें उस वक्त .....और एक सदमा जिसने voi को एक बड़ा झटका दे दिया ,और सच भी यही की हमारा आचल भी इतना लाल हो गया है की अब पता ही नहीं लग रहा की वो खून है या फिर कुछ और ...... मैं वही पर मौजूद था ,मेरे आँखे इस बात की गवाह बन रही थी की आखिर इस इस व्यक्ति में ऐसा क्या था ? जिसने एक तड़पन हमेशा के लिए छोड़ दी शायद हमारे लिए .......... रात के तक़रीबन 11:00 बज रहे है मैं अपने ऑफिस से घर पर आ चूका हूँ ,लेकिन मैंने अपनी आँखों से देखा है उन लम्हों को जिसे मैं शायद कभी भूल नहीं पाऊंगा,ना तो अब हमें कोई जोक सुनाएगा और न ही कोई जोर जोर से चिल्लाएगा ,वैरी गुड सर - आज पूरा माहोल देखा सर के कभी इतना करीब तो नहीं था लेकिन उन्होंने अपने करीब सब को सोचा था ,मेरे लिए यह पल बिलकुल नया है ,मन न जाने क्यों अपने आप को कटोच रहा है .हकीकत यही है की मैं उनके जाने के वक्त को याद करता हूँ तो अपने साथियों को देखता हूँ और फिर एक गहरी उदासी छा जाती है क्योंकि कल फिर ऑफिस जाना है लेकिन कल कोई हाथ मिलाने नहीं आएगा ,ना ही कल कोई पूछेगा तुने गर्ल फ्रेंड बनाई क्या ?................कई बाते अब कभी नहीं होंगी .न्यूज़ रूम में एक बदलावहोगा वही बोरियत हमारे साथ रहेगी .....मैंने कई लोग देखे जिनकी आँखों में आंसूं देखे है सिर्फ रहेगा परिवार के लिए जो हमारे ऑफिस मैं अब तक बना रहा था ,इस्तीफों का दौर तो चलता रहता है लेकिन ऐसा इस्तीफा जिसने एक परिवार तोड़ दिया .जहा खबरों के बीच कोई अपना भी खबर बन गया .मैंने तो अंत तक उनको अलविदा कहा था ,शायद कोई कसक बाकी रह गई थी .लेकिन अपनों को खोने का दुःख पुरे ऑफिस को हुआ था ..... miss u sir miss u ashish ,vipin ,amit
Posted by ASHISH JAIN